Wednesday, 29 April 2020

इरफ़ान खान : एक अनोखा किरदार



इरफ़ान खान राजस्थान एक एक छोटे से कसबे में जन्मा एक लड़का जिसने अपने हुनर से पूरे विश्व में पने नाम का डंका बजवा दिए और जो आज जाते जाते भी पूरे हिन्दुस्तान को रुला गया । इरफ़ान खान ने अपना हुनर क्रिकेट में भी आजमाना चाहा परन्तु पैसे की कमी क कारन वो आगे नहीं बढ़ सके । फिर उन्होंने १९८४ में दिल्ली से राष्ट्रीय नाट्य से अपनी नाट्य शिक्षण की पढ़ाई पूरी की।

इरफ़ान खान ने फ़िल्मी जगत में अपना करियर १९८८ में सलाम बॉम्बे नाम की फिल्म से की और इसमें उनका किरदार काफी लोग को पसंद आया उनकी अंतिम फिल्म अंग्रेजी मध्यम में भी उनका किरदार कबील-ऐ-तारीफ है।


इरफ़ान खान ने कभी कोई किरादर को छोटा नहीं समझा , वो एक सुलझे हुए कलाकार थे । हिन्दी अंग्रेजी फ़िल्मों, व टेलीविजन के एक कुशलअभिनेता रहे हैं। उन्होने द वारियर, मकबूल, हासिल, द नेमसेक, रोग जैसी फिल्मों मे अपने अभिनय का लोहा मनवाया। हासिल फिल्म के लिये उन्हे वर्ष २००४ का फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। वे बालीवुड की ३० से ज्यादा फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं। इरफान हॉलीवुड मे भी एक जाना पहचाना नाम हैं। वह ए माइटी हार्ट, स्लमडॉग मिलियनेयर, लाइफ ऑफ़ पाई और द अमेजिंग स्पाइडर मैन फिल्मों मे भी काम कर चुके हैं। 2011 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया।  60वे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 2012 में इरफ़ान खान को फिल्म पान सिंह तोमर में अभिनय के लिए श्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार दिया जा चूका है ।
कुछ वर्ष पहले जब एक इवेंट में उनसे मुलाकात  हुई थी तो उनकी सादगी देख कर मे खुद दंग हो गया था , इतना बड़ा एक्टर और रेष मात्र का घमंड नहीं । इरफ़ान खान हमेशा  से हसमुख व्यक्ति रहें हैं ।





पिछले कुछ वर्षों से वे न्यूरो इंडोक्राइन कैंसर से जूझ रहे थे और आज २९ अप्रैल २०२० को मुंबई में इरफ़ान खान ने अपनी आखिरी सांस ली और पूरे हिंदुस्तान को शोक में डूबा पंचतत्व में विलीन हो गए । इतनी विलक्षण प्रतिभा इ संपन्न व्यक्ति एक युग में एक ही बार जन्म लेता है ।

भगवन आपकी आत्मा को शांति दे ।

ॐ शांति 

Saturday, 21 December 2019

नागरिकता कानून और आंदोलन




  नागरिकता के कनून संशोधन विधेयक २०१९ के पारित होने  पश्चात देश के कोने कोने में आंदोलन हो रहे हैं। कुछ इन्हें सही तो देश की अधिकांश जनता इसे गलत ठहरा रही है। आपको और हमको इस बिल से होने वाले नुकसान के बारे में एक बार अवश्य सोचना पड़ेगा।

क्या है नागरिकता के कानून २०१९ का संसोधन????

३१ दिसम्बर २०१४ तक पाकिस्तान, बांग्लादेश, और अफगानिस्तान से धार्मिक हिंसा व उत्पीड़न के चलते आने वाले हिन्दू, सिख, इसे बौद्ध, जैन , पारसी और ईसाई समुदाय के शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है। इसके अलावा आये अन्य धर्म के लोंगो और विदेशियों को इस क़ानून का फायदा नहीं मिलेगा।

क्यों है इतना बवाल???

इस कानून से ३१ दिसंबर २०१४ तक आये शरणार्थियों को नागरिकतो मिल जाएगी परंतु नागरिक के तौर पर मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं पर होने वाले खर्च का भारत की GDP पर खासा असर होगा। इस कानून में नए संशोधन की जरूरत अभी क्या थी? वो भी उस समय जब भारत वैष्विक स्तर पर भारी आर्थिक मंदी की मार झेल रहा हो।

आंदोलन क्यों??

नागरिकता कानून के तहद आये लोगों को नागरिकता प्रदान करने के बाद ग़ैरनागरिको का पता लगाने हेतु NRC लाकर एक बार फिरसे सबको कतार में खड़ा होना पड़ेगा यह डर लोंगों को सता रहा है। जो लोग कह रहे हैं की CAA का और NRC का कोई लेना देना नही है उनसे एक प्रश्न है कि CAA में छांटे जाने के बाद क्या होगा? क्या बाकी लोंगों को पाकिस्तान अफगानिस्तान या बांग्लादेश वापस भेजा जाएगा? या उन्हें डिटेंशन कैम्प में रखा जाएगा? क्या डिटेंशन कैंपो पर हो रहे खर्चे अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त भार नही डालेंगे? CAA के बाद देश के नागरिकों और ग़ैरनागरिको कि पहचान किस आधार पर होगी??

जिस समय देश भयंकर आर्थिक मंदी , बेरोजगारी, और महंगाई की चौतरफा मार झेल रहा हो उस समय लाया गया यह बिल भारतवर्ष की अर्थव्यवस्था को जड़ से हिलाने पर कारगर सबूत होगा। और यह बिल भारत वर्ष का नोटबन्दी के बाद दूसरा सबसे बड़ा भ्रष्टाचार साबित होगा।

हम आखिर खुद की जनता को सुविधाएं देना छोड़ पाकिस्तान अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक लोगों की चिंता क्यों कर रहे हैं? क्यों अपने ऊपर अनावश्यक भार लेना चाह रहे हैं? यह बात सोचना और समझना आवश्यक है। किसी धर्म के लिहाज से सोचना छोड़ एक राष्ट्र निर्माण के हिसाब से सोचिये जवाब मिल जाएगा।

जय हिंद
जय भारत

आशीष द्विवेदी की कलम से






Tuesday, 19 December 2017

दहेज़ : प्रथा या अभिशाप

          भारतीय संस्कृति में जिस विवाह संस्कार की पद्धति का वर्णन है वह अतुलनीय है , किंतु कुछ समय से एक लालची समुदाय के द्वारा इस पूजनीय संस्कार का मजाक उड़ाया जा रहा है ।
           हिन्दू धर्म के अनुसार जब किसी व्यक्ति में परिवार निर्माण की जिम्मेदारी निभाने योग्य मानसिक,  शारीरिक परिपक्वता आ जाती है तो वो विवाह के योग्य माना जाता है ।
           विवाह संस्कार पद्धति में कहीं भी दहेज़ प्रथा का वर्णन नही किया गया है। दहेज़ प्रथा एक उपहार के तौर पर शुरू हुई थी और आज वह अपने सबसे निकृष्ट स्तर को दर्शाने लगी है। कई शादियां मंडप से वापस लौट जाती हैं।
          दहेज़ ने समाज को बीमार कर दिया है। यदि मुझे दहेज़ की व्याख्या देनी पड़े तो वह कुछ इस प्रकार होगी "दहेज़ एक प्रथा नही बल्कि भीख मांगने की सामाजिक  तरीका है, फर्क इतना है कि इसमें दहेज़ देने वाले की गर्दन हमेशा झुकी होती है और लेने वाले में अकड़ बनी रहती है"। हमारे समाज में कुछ ऐसे पशु रूपी इंसान भी पाए जाते हैं जो दहेज़ न मिलने पर प्रताड़ित करने में अपनी मानवीय मूल्यों से परे हटकर हैवानियत की सारी सीमाएं लाँघ देते हैं। दहेज़ न मिलने के कारण ससुराल पक्ष द्वारा दी जा रही प्रताड़ना से तंग आकर अधिकांश महिलाएं मृत्यु का वरण कर लेती हैं। भारतीय राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो से प्राप्त जानकारी के अनुसार 2012 में दहेज़ प्रताड़ना से तंग होकर 18233 मृत्यु की घटनाएं दर्ज की गयी हैं। यह बड़े शर्म की बात है कि जिस गौरवशाली देश में स्रियों को माता का दर्जा दिया जाता है वहां पर कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले लोग समाज को खोखला करने में लगे हुए हैं।
           हालाँकि अब इसका विरोध करने की क्षमता आज के युवाओं में पैदा होने लगी है। क़ानूनी नजर से देखें तो दहेज़ लेना व देना दोनों अपराध है, यदि कोई दहेज़ की मांग करता है या इसको किसी भी रूप में बढ़ावा देता है तो यह कानूनन अपराध है। यदि कोई ऐसा करता है तो भारतीय न्याय सहिंता के अनुसार धारा 3(दहेज़ लेने), 4(दहेज़ देने),498(A)(दहेज़ के लिए क्रूरता) और धारा 304 (प्रताड़ना के वजह से होने वाली मृत्यु) के अंतर्गत शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
        दहेज़ प्रथा से होने वाला नुकसान हमारे अपने समाज का है। अब उचित समय आ गया है कि हम प्रण
करें की हम न दहेज़ लेंगे और न ही दहेज़ देंगे। यदि आज कोई ठोस कदम नही उठाये गए तो याद रखिए कल को यह आपके और हमारे घर को भी जला सकता है। इसलिए यह चिंगारी भीषण आग का रूप ले ले इसे पानी डाल कर बुझा देने में ही भलाई है।
जय हिंद
जय भारत
                                        आशीष द्विवेदी की कलम से

Friday, 6 October 2017

राजनीति और हम

                        नागरिक स्तर पर या व्यक्तिगत स्तर पर कोई विशेष प्रकार का सिद्धान्त एवं व्यव्हार  राजनीति कहलाती है। हालाँकि आज कल की राजनीति में कुछ बदलाव जरूर आये है । आज राजनीति की परिभाषा देखी जाए तो कुछ इस प्रकार होगी "व्यक्तिगत स्तर पर या सामाजिक स्तर पर कोई विशेष प्रकार की दुश्मनी या बदला लेने का व्यवहार राजनीति कहलाती है"। साफ सुथरे शब्दों में कहे तो राजनीती हमारे रोजमर्रा के जिंदगी का एक अभिन्न अंग बन चुका है | हम क्या करते है क्या सोचते है कैसे करते है सब राजनीती से ही प्रेरित होता है |  यदि सामाजिक स्तर पर सोचा जाये  की जीवन राजनितिक विज्ञानं से बचा हुआ है तो शायद जवाब होगा नहीं ; समाज के सुदृढ़ संरचना के लिए राजनितिक विज्ञानं की उतनी ही आवश्यकता है जितना जीवन जीने के लिए ऑक्सीजन की है |
                          कुछ दशक पहले की राजनीति का वर्णन किया जाय तो वह पहले वाली परिभाषा पर शत प्रतिशत खरी उतरती थी लेकिन पिछले कुछ सालों से जो नई परिभाषा आयी है वह सिर्फ व्यग्तिगत फायदा लेने की दृष्टि वाली आयी है | आज कल की राजनितिक जीवन में लोग ऐसा बर्ताव क्यों करते है इस बात की कथानक और व्यवस्थित अध्ययन करने की बहुत आवश्यकता  है | राजनितिक व्यवहार की अवधारणा को यदि समझने की कोशिश की जाये तो यह स्पष्ट हो जाएगा की राजनीती पूर्ण रूप से सामाजिक और आर्थिक मूल्यों से जुडी हुई है | यदि आर्थिक व्यव्हार को राजनीती से दूर रखा जाये तो यह एक तरह की नाइंसाफी होगी | 
                                    
                           आज की युवा पीढ़ी बड़ी जोश और गर्व से ये कहती है की उन्हें राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है  | उनके अवधारणा के मुताबिक राजनीति एक प्रकार से व्यग्तिगत अथवा केंद्रित समूहों द्वारा अपने लाभों को पूर्ण करने के लिए राज्य सत्ता प्रणाली में अपने स्थान को बनाये रखने की अध्भुत कला है उनकी यह सोच काफी हद तक सत्य भी प्रमाणि होती  है उनकी यह सोच आज कल की राज्य प्रणाली को देखते हुए पैदा हुई है ।
             हालाँकि भारत वर्ष सदैव ही गौरवशाली गुरुओं का प्रतीक रहा है जहाँ पर एक मामूली सा ब्राह्मण एक राह चलते बालक को सड़क से उठाकर अपनी समग्र कूटनीतियों का प्रयोग कर उस बालक को अखंड भारत वर्ष का सम्राट बना देता है; जहाँ पर एक गुरु अपने शाशक शिष्य को धर्म का मार्ग सिखाने के लिए बीच युद्ध में गीता का सार सुना देता है , आज की इस राजनीतिक अभ्यासक्रम में ऐसे गुरुओं के प्रखंड ज्ञान की कमी खल रही है | आध्यात्मिक गुरु जिनका कार्य लोगो के बीच आध्यात्म का ज्ञान प्रसारित करना है है यदि वो राजनीति के गलियारों में उतर कर उच्च पदासीन आकाओं की चापलूसी करने लगे की कब ये आये और मेरा आश्रम बडा हो जाये तो इस देश की उन्नति नही हो सकती । धर्म के नाम पर ढोंग कर रहे धर्म गुरु जो नफरत फैलाने की कोशिश में है यदि वो धर्म का असल अर्थ लोगो तक पहुचाना शुरू करे तो देश की काफी उन्नति होगी ।
             अराजकतावाद का सिद्धांत राज्य को समाप्त कर वहाँ रह रहे व्यक्तियों, समूहों और वहां राष्ट्रों के अंतर्गत आपसी सहयोगों द्वारा मानवीय मूल्यों के न्याय सम्बन्धो में न्याय को स्थापित करने के प्रयत्नों पर आधारित है | राजनीती में अगर आप सुनना बंद कर देंगे तो किसी भी राज्य या क्षेत्र का विकास नहीं हो सकता । अगर आप ये सोचे की हम तो ५ वर्ष के लिए निर्वाचित हो गए है अब हमारा कोई कुछ नही कर सकता तो यह सरासर गलत है। आज राजनीति एक अप्रासंगिक विषय बन चूका है लोग अपने बेडरूम में बैठकर शाम को चाय की चुस्कियों के साथ सरकार द्वारा हो रहे गलत कार्यों की चर्चा तो करते हैं परंतु उसे सुधरने के लिए खुद जमींन पर उतरना नही चाहते। 
                   हमें बताया गया है कि गणतंत्र हमें पश्चिम देशों ने सिखया है लेकिन आज से 2000 वर्ष पूर्व कालिदास द्वारा रचित प्रख्यात नाटक अभिज्ञान शाकुन्तलम में लोकतंत्र की परिभाषा कुछ इस प्रकार दी गयी है "अविश्रमोयम लोकतंत्रस्य सर्वाधिकारः" अर्थात आपका अपने राजा से मिलना यह आपका  लोकतान्त्रिक अधिकार है आप जब चाहें तब अपने राजा से मिल सकते हैं । यह परिभाषा आज के लोकतान्त्रिक अधिकार से धूमिल हो चुकी है। 
                  यदि आपका प्रधान सेवक आपके अधिकारों का हनन करता है या अपने कार्यों को सुचारू रूप से करने में असमर्थ है तो उस युग के शिक्षक, धर्मगुरु समाज से जुड़े लोगो का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह समाज को सुधारने के लिए सड़क पर उतरे।
               अंत में इतना कहना चाहूंगा कि "राजनीती यह समाज को सुधारने के लिए है न की अपने खुद के फायदे के लिए" | अगर राजनीती अयोग्य बेटों के हाथ लग गयी तो देश को बर्बाद होने से कोई नही रोक सकता और यदि ये योग्य बेटों के हाथ में आयी तो भारत का सर्वोपरि बनाने का अब्दुल कलाम जी का सपना इसी सदी में पूरा हो जाएगा ।
जय हिंद
जय भारत
आशीष द्विवेदी की कलम से



Saturday, 10 June 2017

किसान : अन्नदाता

      

                  पिछले दिनों महाराष्ट्र में किसानो पर जो कार्यवाही हुई उससे मैं काफी आहत हुआ हूँ और अपनी सोच को अंकित करने पर मजबूर हुआ हूँ | मध्य प्रदेश में पुलिस प्रशाशन द्वारा किसानो पर इसलिए गोली चलने की कार्यवाही करनी पड़ी क्यूंकि किसान उग्र हो गये थे चलिए आज इसी मसले पर थोड़ी रौशनी डाली जाये | 
                     जब मैं स्कूल जाता था तब मेरे भूगोल के शिक्षक ने एक पाठ में सिखाया की हमारा भारत देश एक कृषि प्रधान देश है और हमारे देश की अधिकतर आय (जीडीपी) कृषि पर ही निर्भर करती है |परान्त यदि आकड़ों पर नजर डाली जय तो देख कर काफी शर्मिंदगी महसूस होगी की बड़ी तेजी से  किसान कर्ज के कारण आत्महत्या जैसे कदम उठा रहर हैं | NATIONAL SAMPLE SURVEY ORGANIZATION (NSSO) संस्था द्वारा २०१३ में किये गए सर्वे के अनुसार किसान की औसतन मासिक आय ६४२६ रुपये थी और उसी वर्ष की औसतन व्यय राशि थी ६२२३ रुपये | मतलब कुल मिला के वर्ष २०१३ में उनकी औसत मासिक बचत मात्र २०३ रूपये रही |

आखिर देख मरते किसान को
 नींद कैसे आती होगी देश के प्रधान को

                       अब आते है असल मुद्दे पर महंगाई दर २०१३ के हिसाब से २०१७ में बहुत ज्यादा बढ़ गयी है और  वर्ष २०१३ में भी मात्रा ६४२६ रुपये में अपने परिवार का पालन पोषण ठीक से नहीं हो सकता था | अपनी निजी जिंदगी को सुचारू रूप से चलाने के लिए तथा अपने बच्चो की पढ़ाई को पूर्ण करने के लिए फिर ये लाचार किसान कर्जदारों के पास जाकर अपनी जमीन या सम्पति का कोई हिस्सा गिरवी रख कर्ज लेता है और फिर उसे उचित निर्धारित समय पर न वापस कर पाने से व्याज बढ़ता जाता है और फीर उस किसान के पास आत्म हत्या करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता |सरकार द्वारा किये गए सभी वादे महज एक पन्ने पर अंकित बेकार शब्द बन कर रह गए हैं|  सरकार बनाने के लिए किसानो और गरीबो के लिए जुमलों की बौछार की जाती है | और बाद में वही सरकार बनते ही सारे वादे गायब हो जाते हैं | 
                    महाराष्ट्र  में प्रदर्शन कर रहे किसान भाइयों पर पुलिस प्रशाशन द्वारा बर्बरता से गोली चली गयी और ये कहा गया की प्रदर्शन कर रहे किसान उग्र हो गए थे उन्हें शांत कराने के लिए गोली चलनी पड़ीं | इस जवाब से मेरे मन में कुछ और सवाल खड़े हो गए हैं 

१) किसानो के उग्र होने का कारन कौन है ?
२) क्या इस स्तिथि को किसी और तरीके से नहीं संभाला जा सकता था ?
३) क्या किसानो के लिए कोई ऐसा फैसला नहीं लिया जा सकता की उन्हें प्रदर्शन करने की जरुरत ही न पड़ती ?
आखिरी सवाल 
४) अगर महाराष्ट्र  के किसानो पर उग्र होने की वजह से गोली चलनी पड़ी तो क्या कश्मीर में हो रहे उग्रवादिता को ध्यान में रख कर वहा की सरकार  द्वारा भो गोली का आदेश नहीं दे देना चाहिए ?
जो भगवान का सौदा करता है,
वो इंसान की क़ीमत क्या जाने? 
जो ‘धान’ की क़ीमत दे न सका, 
वो ‘जान’ की कीमत क्या जाने?
                                          @DrKumarVishwas

                         मैं बस  यही कहूंगा की इसपर सभी राजनितिक दाल को एकजुट होकर इस समस्या का समाधान निकलना चाहिए वरना जिस देश की अर्थव्यवस्था में सबसे अहम् योगदान जिसका है यदि उसे ही  जंतर मंतर पर मूत्र पी कर धरना देन पड़े या धरना देते समय गोली का शिकार होना पड़े  तो उस देश के लिए  इससे ज्यादा शर्म की बात नहीं होगी | किसान हमारे अन्नदाता हैं इन्ही की वजह से २ वक्त की रोटी मिलती है हमे इनकी इज्जत करनी चाहिए और इनकी तकलीफों का जल्द से जल्द निवारण करना चाहिए नहीं तो स्थिति आगे और बिगड़ते ही जाएगी.................

                  जय हिन्द  
जय जवान जय किसान
ASHISH DWIVEDI की कलम से 




Saturday, 26 April 2014

BLOGSPOT: अशफ़ाक उल्ला खां की कुछ बातें .

BLOGSPOT: 

अशफ़ाक उल्ला खां की कुछ बातें 


अंग्रेजी शासन से देश को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अशफ़ाक उल्ला खां ना सिर्फ एक निर्भय और प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे बल्कि उर्दू भाषा के एक बेहतरीन कवि भी थे. पठान परिवार से संबंधित अशफ़ाक उल्ला खां का जन्म 22 अक्टूबर, 1900 को शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था. अशफ़ाक उल्ला खां ने स्वयं अपनी डायरी में यह लिखा है कि जहां उनके पिता के परिवार में कोई भी स्नातक की पढ़ाई पूरी नहीं कर सका वहीं उनके ननिहाल में सभी लोग उच्च-शिक्षित और ब्रिटिश सरकार के अधीन प्रमुख पदों पर कार्यरत थे. चार भाइयों में अशफ़ाक सबसे छोटे थे. इनके बड़े भाई रियायत उल्ला खां, राम प्रसाद ‘`बिस्मिल`‘ के सहपाठी थे. जिस समय अंग्रेजी सरकार द्वारा बिस्मिल को भगोड़ा घोषित किया गया था, तब रियायत, अपने छोटे भाई अशफ़ाक को उनके कार्यों और शायरी के विषय में बताया करते थे. भाई की बात सुनकर ही अशफ़ाक के भीतर राम प्रसाद बिस्मिल से मिलने की तीव्र इच्छा विकसित हुई. लेकिन इस समय इसका कारण सिर्फ शायरी था. आगे चलकर दोनों के बीच दोस्ती का गहरा संबंध विकसित हुआ. अलग-अलग धर्म के अनुयायी होने के बावजूद दोनों में गहरी और निःस्वार्थ मित्रता थी. 1920 में जब बिस्मिल वापिस शाहजहांपुर आ गए थे, तब अशफ़ाक ने उनसे मिलने की बहुत कोशिश की, पर बिस्मिल ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया. वर्ष 1922 में जब असहयोग आंदोलन की शुरूआत हुई तब बिस्मिल द्वारा आयोजित सार्वजनिक सभाओं में भाग लेकर अशफ़ाक उनके संपर्क में आए. शुरूआत में उनका संबंध शायरी और मुशायरों तक ही सीमित था. अशफ़ाक उल्ला खां अपनी शायरी सबसे पहले बिस्मिल को ही दिखाते थे.

राम प्रसाद बिस्मिल से दोस्ती
चौरी-चौरा कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने अपना असयोग आंदोलन वापस ले लिया था, तब हजारों की संख्या में युवा खुद को धोखे का शिकार समझ रहे थे. अशफ़ाक उल्ला खां उन्हीं में से एक थे. उन्हें लगा अब जल्द से जल्द भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति मिलनी चाहिए. इस उद्देश्य के साथ वह शाहजहांपुर के प्रतिष्ठित और समर्पित क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के साथ जुड़ गए. आर्य समाज के एक सक्रिय सदस्य और समर्पित हिंदू राम प्रसाद बिस्मिल अन्य धर्मों के लोगों को भी बराबर सम्मान देते थे. वहीं दूसरी ओर एक कट्टर मुसलमान परिवार से संबंधित अशफ़ाक उल्ला खां भी ऐसे ही स्वभाव वाले थे. धर्मों में भिन्नता होने के बावजूद दोनों का मकसद सिर्फ देश को स्वराज दिलवाना ही था. यही कारण है कि जल्द ही अशफ़ाक, राम प्रसाद बिस्मिल के विश्वासपात्र बन गए. धीरे-धीरे इनकी दोस्ती भी गहरी होती गई.

काकोरी कांड
जब क्रांतिकारियों को यह लगने लगा कि अंग्रेजों से विनम्रता से बात करना या किसी भी प्रकार का आग्रह करना फिजूल है तो उन्होंने विस्फोटकों और गोलीबारी का प्रयोग करने की योजना बनाई. इस समय जो क्रांतिकारी विचारधारा विकसित हुई वह पुराने स्वतंत्रता सेनानियों और गांधी जी की विचारधारा से बिलकुल उलट थी. लेकिन इन सब सामग्रियों के लिए अधिकाधिक धन की आवश्यकता थी. इसीलिए राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार के धन को लूटने का निश्चय किया. उन्होंने सहारनपुर-लखनऊ 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन में जाने वाले धन को लूटने की योजना बनाई. 9 अगस्त, 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफ़ाक उल्ला खां समेत आठ अन्य क्रांतिकारियों ने इस ट्रेन को लूटा.

काकोरी कांड में फांसी
जब अंग्रेजी सरकार को क्रांतिकारी गतिविधियों से भय लगने लगा तो उन्होंने बिना सोचे-समझे क्रांतिकारियों की धर-पकड़ शुरू कर दी. इस दौरान राम प्रसाद बिस्मिल अपने साथियों के साथ पकड़े गए लेकिन अशफ़ाक उल्ला खां उनकी पकड़ में नहीं आए. पहले वह बनारस गए और फिर बिहार जाकर लगभग दस महीने तक एक इंजीनियरिंग कंपनी में कार्य करते रहे. वे लाला हर दयाल से मिलने के लिए देश से बाहर भी जाना चाहते थे. इसीलिए वह अपने दोस्त के पास दिल्ली आ गए ताकि यहां से विदेश जाने का रास्ता ढूंढ पाएं. लेकिन उनके दोस्त ने उनके साथ विश्वासघात कर पुलिस को उनकी सूचना दे दी. पुलिस ने अशफ़ाक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. जेल अधिकारी तसद्दुक हुसैन ने धर्म का सहारा लेकर बिस्मिल और अशफ़ाक की दोस्ती तोड़ने की कोशिश की, पर इससे कोई लाभ हासिल नहीं हुआ. अशफ़ाक उल्ला खां को फैजाबाद जेल में रखकर कड़ी यातनाएं दी गईं. काकोरी कांड में चार लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई जिनमें राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खां शामिल थे. 19 दिसंबर, 1927 को एक ही दिन एक ही समय लेकिन अलग-अलग जेलों (फैजाबाद और गोरखपुर) में दो दोस्तों, राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां, को फांसी दे दी गई.

अशफ़ाक उल्ला खां एक बहुत अच्छे कवि थे. अपने उपनाम वारसी और हसरत से वह शायरी और गजलें लिखते थे. लेकिन वह हिंदी और अंग्रेजी में भी लिखते थे. अपने अंतिम दिनों में उन्होंने कुछ बहुत प्रभावी पंक्तियां लिखीं, जो उनके बाद स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे लोगों के लिए मार्गदर्शक साबित हुईं.

  • किये थे काम हमने भी जो कुछ भी हमसे बन पाए, ये बातें तब की हैं आज़ाद थे और था शबाब अपना; मगर अब तो जो कुछ भी हैं उम्मीदें बस वो तुमसे हैं, जबां तुम हो, लबे-बाम आ चुका है आफताब अपना।
  • जाऊंगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगाजाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा? बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं “फिर आऊंगा, फिर आऊंगा,फिर आकर के ऐ भारत मां तुझको आज़ाद कराऊंगा”. जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ, मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूं; हां खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूंगाऔर जन्नत के बदले उससे यक पुनर्जन्म ही माँगूंगा