नागरिक स्तर पर या व्यक्तिगत स्तर पर कोई विशेष प्रकार का सिद्धान्त एवं व्यव्हार राजनीति कहलाती है। हालाँकि आज कल की राजनीति में कुछ बदलाव जरूर आये है । आज राजनीति की परिभाषा देखी जाए तो कुछ इस प्रकार होगी "व्यक्तिगत स्तर पर या सामाजिक स्तर पर कोई विशेष प्रकार की दुश्मनी या बदला लेने का व्यवहार राजनीति कहलाती है"। साफ सुथरे शब्दों में कहे तो राजनीती हमारे रोजमर्रा के जिंदगी का एक अभिन्न अंग बन चुका है | हम क्या करते है क्या सोचते है कैसे करते है सब राजनीती से ही प्रेरित होता है | यदि सामाजिक स्तर पर सोचा जाये की जीवन राजनितिक विज्ञानं से बचा हुआ है तो शायद जवाब होगा नहीं ; समाज के सुदृढ़ संरचना के लिए राजनितिक विज्ञानं की उतनी ही आवश्यकता है जितना जीवन जीने के लिए ऑक्सीजन की है |
कुछ दशक पहले की राजनीति का वर्णन किया जाय तो वह पहले वाली परिभाषा पर शत प्रतिशत खरी उतरती थी लेकिन पिछले कुछ सालों से जो नई परिभाषा आयी है वह सिर्फ व्यग्तिगत फायदा लेने की दृष्टि वाली आयी है | आज कल की राजनितिक जीवन में लोग ऐसा बर्ताव क्यों करते है इस बात की कथानक और व्यवस्थित अध्ययन करने की बहुत आवश्यकता है | राजनितिक व्यवहार की अवधारणा को यदि समझने की कोशिश की जाये तो यह स्पष्ट हो जाएगा की राजनीती पूर्ण रूप से सामाजिक और आर्थिक मूल्यों से जुडी हुई है | यदि आर्थिक व्यव्हार को राजनीती से दूर रखा जाये तो यह एक तरह की नाइंसाफी होगी |
आज की युवा पीढ़ी बड़ी जोश और गर्व से ये कहती है की उन्हें राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है | उनके अवधारणा के मुताबिक राजनीति एक प्रकार से व्यग्तिगत अथवा केंद्रित समूहों द्वारा अपने लाभों को पूर्ण करने के लिए राज्य सत्ता प्रणाली में अपने स्थान को बनाये रखने की अध्भुत कला है उनकी यह सोच काफी हद तक सत्य भी प्रमाणि होती है उनकी यह सोच आज कल की राज्य प्रणाली को देखते हुए पैदा हुई है ।
हालाँकि भारत वर्ष सदैव ही गौरवशाली गुरुओं का प्रतीक रहा है जहाँ पर एक मामूली सा ब्राह्मण एक राह चलते बालक को सड़क से उठाकर अपनी समग्र कूटनीतियों का प्रयोग कर उस बालक को अखंड भारत वर्ष का सम्राट बना देता है; जहाँ पर एक गुरु अपने शाशक शिष्य को धर्म का मार्ग सिखाने के लिए बीच युद्ध में गीता का सार सुना देता है , आज की इस राजनीतिक अभ्यासक्रम में ऐसे गुरुओं के प्रखंड ज्ञान की कमी खल रही है | आध्यात्मिक गुरु जिनका कार्य लोगो के बीच आध्यात्म का ज्ञान प्रसारित करना है है यदि वो राजनीति के गलियारों में उतर कर उच्च पदासीन आकाओं की चापलूसी करने लगे की कब ये आये और मेरा आश्रम बडा हो जाये तो इस देश की उन्नति नही हो सकती । धर्म के नाम पर ढोंग कर रहे धर्म गुरु जो नफरत फैलाने की कोशिश में है यदि वो धर्म का असल अर्थ लोगो तक पहुचाना शुरू करे तो देश की काफी उन्नति होगी ।
अराजकतावाद का सिद्धांत राज्य को समाप्त कर वहाँ रह रहे व्यक्तियों, समूहों और वहां राष्ट्रों के अंतर्गत आपसी सहयोगों द्वारा मानवीय मूल्यों के न्याय सम्बन्धो में न्याय को स्थापित करने के प्रयत्नों पर आधारित है | राजनीती में अगर आप सुनना बंद कर देंगे तो किसी भी राज्य या क्षेत्र का विकास नहीं हो सकता । अगर आप ये सोचे की हम तो ५ वर्ष के लिए निर्वाचित हो गए है अब हमारा कोई कुछ नही कर सकता तो यह सरासर गलत है। आज राजनीति एक अप्रासंगिक विषय बन चूका है लोग अपने बेडरूम में बैठकर शाम को चाय की चुस्कियों के साथ सरकार द्वारा हो रहे गलत कार्यों की चर्चा तो करते हैं परंतु उसे सुधरने के लिए खुद जमींन पर उतरना नही चाहते।
हमें बताया गया है कि गणतंत्र हमें पश्चिम देशों ने सिखया है लेकिन आज से 2000 वर्ष पूर्व कालिदास द्वारा रचित प्रख्यात नाटक अभिज्ञान शाकुन्तलम में लोकतंत्र की परिभाषा कुछ इस प्रकार दी गयी है "अविश्रमोयम लोकतंत्रस्य सर्वाधिकारः" अर्थात आपका अपने राजा से मिलना यह आपका लोकतान्त्रिक अधिकार है आप जब चाहें तब अपने राजा से मिल सकते हैं । यह परिभाषा आज के लोकतान्त्रिक अधिकार से धूमिल हो चुकी है।
यदि आपका प्रधान सेवक आपके अधिकारों का हनन करता है या अपने कार्यों को सुचारू रूप से करने में असमर्थ है तो उस युग के शिक्षक, धर्मगुरु समाज से जुड़े लोगो का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह समाज को सुधारने के लिए सड़क पर उतरे।
अंत में इतना कहना चाहूंगा कि "राजनीती यह समाज को सुधारने के लिए है न की अपने खुद के फायदे के लिए" | अगर राजनीती अयोग्य बेटों के हाथ लग गयी तो देश को बर्बाद होने से कोई नही रोक सकता और यदि ये योग्य बेटों के हाथ में आयी तो भारत का सर्वोपरि बनाने का अब्दुल कलाम जी का सपना इसी सदी में पूरा हो जाएगा ।
जय हिंद
जय भारत
आशीष द्विवेदी की कलम से