Tuesday, 19 December 2017

दहेज़ : प्रथा या अभिशाप

          भारतीय संस्कृति में जिस विवाह संस्कार की पद्धति का वर्णन है वह अतुलनीय है , किंतु कुछ समय से एक लालची समुदाय के द्वारा इस पूजनीय संस्कार का मजाक उड़ाया जा रहा है ।
           हिन्दू धर्म के अनुसार जब किसी व्यक्ति में परिवार निर्माण की जिम्मेदारी निभाने योग्य मानसिक,  शारीरिक परिपक्वता आ जाती है तो वो विवाह के योग्य माना जाता है ।
           विवाह संस्कार पद्धति में कहीं भी दहेज़ प्रथा का वर्णन नही किया गया है। दहेज़ प्रथा एक उपहार के तौर पर शुरू हुई थी और आज वह अपने सबसे निकृष्ट स्तर को दर्शाने लगी है। कई शादियां मंडप से वापस लौट जाती हैं।
          दहेज़ ने समाज को बीमार कर दिया है। यदि मुझे दहेज़ की व्याख्या देनी पड़े तो वह कुछ इस प्रकार होगी "दहेज़ एक प्रथा नही बल्कि भीख मांगने की सामाजिक  तरीका है, फर्क इतना है कि इसमें दहेज़ देने वाले की गर्दन हमेशा झुकी होती है और लेने वाले में अकड़ बनी रहती है"। हमारे समाज में कुछ ऐसे पशु रूपी इंसान भी पाए जाते हैं जो दहेज़ न मिलने पर प्रताड़ित करने में अपनी मानवीय मूल्यों से परे हटकर हैवानियत की सारी सीमाएं लाँघ देते हैं। दहेज़ न मिलने के कारण ससुराल पक्ष द्वारा दी जा रही प्रताड़ना से तंग आकर अधिकांश महिलाएं मृत्यु का वरण कर लेती हैं। भारतीय राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो से प्राप्त जानकारी के अनुसार 2012 में दहेज़ प्रताड़ना से तंग होकर 18233 मृत्यु की घटनाएं दर्ज की गयी हैं। यह बड़े शर्म की बात है कि जिस गौरवशाली देश में स्रियों को माता का दर्जा दिया जाता है वहां पर कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले लोग समाज को खोखला करने में लगे हुए हैं।
           हालाँकि अब इसका विरोध करने की क्षमता आज के युवाओं में पैदा होने लगी है। क़ानूनी नजर से देखें तो दहेज़ लेना व देना दोनों अपराध है, यदि कोई दहेज़ की मांग करता है या इसको किसी भी रूप में बढ़ावा देता है तो यह कानूनन अपराध है। यदि कोई ऐसा करता है तो भारतीय न्याय सहिंता के अनुसार धारा 3(दहेज़ लेने), 4(दहेज़ देने),498(A)(दहेज़ के लिए क्रूरता) और धारा 304 (प्रताड़ना के वजह से होने वाली मृत्यु) के अंतर्गत शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
        दहेज़ प्रथा से होने वाला नुकसान हमारे अपने समाज का है। अब उचित समय आ गया है कि हम प्रण
करें की हम न दहेज़ लेंगे और न ही दहेज़ देंगे। यदि आज कोई ठोस कदम नही उठाये गए तो याद रखिए कल को यह आपके और हमारे घर को भी जला सकता है। इसलिए यह चिंगारी भीषण आग का रूप ले ले इसे पानी डाल कर बुझा देने में ही भलाई है।
जय हिंद
जय भारत
                                        आशीष द्विवेदी की कलम से

Friday, 6 October 2017

राजनीति और हम

                        नागरिक स्तर पर या व्यक्तिगत स्तर पर कोई विशेष प्रकार का सिद्धान्त एवं व्यव्हार  राजनीति कहलाती है। हालाँकि आज कल की राजनीति में कुछ बदलाव जरूर आये है । आज राजनीति की परिभाषा देखी जाए तो कुछ इस प्रकार होगी "व्यक्तिगत स्तर पर या सामाजिक स्तर पर कोई विशेष प्रकार की दुश्मनी या बदला लेने का व्यवहार राजनीति कहलाती है"। साफ सुथरे शब्दों में कहे तो राजनीती हमारे रोजमर्रा के जिंदगी का एक अभिन्न अंग बन चुका है | हम क्या करते है क्या सोचते है कैसे करते है सब राजनीती से ही प्रेरित होता है |  यदि सामाजिक स्तर पर सोचा जाये  की जीवन राजनितिक विज्ञानं से बचा हुआ है तो शायद जवाब होगा नहीं ; समाज के सुदृढ़ संरचना के लिए राजनितिक विज्ञानं की उतनी ही आवश्यकता है जितना जीवन जीने के लिए ऑक्सीजन की है |
                          कुछ दशक पहले की राजनीति का वर्णन किया जाय तो वह पहले वाली परिभाषा पर शत प्रतिशत खरी उतरती थी लेकिन पिछले कुछ सालों से जो नई परिभाषा आयी है वह सिर्फ व्यग्तिगत फायदा लेने की दृष्टि वाली आयी है | आज कल की राजनितिक जीवन में लोग ऐसा बर्ताव क्यों करते है इस बात की कथानक और व्यवस्थित अध्ययन करने की बहुत आवश्यकता  है | राजनितिक व्यवहार की अवधारणा को यदि समझने की कोशिश की जाये तो यह स्पष्ट हो जाएगा की राजनीती पूर्ण रूप से सामाजिक और आर्थिक मूल्यों से जुडी हुई है | यदि आर्थिक व्यव्हार को राजनीती से दूर रखा जाये तो यह एक तरह की नाइंसाफी होगी | 
                                    
                           आज की युवा पीढ़ी बड़ी जोश और गर्व से ये कहती है की उन्हें राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है  | उनके अवधारणा के मुताबिक राजनीति एक प्रकार से व्यग्तिगत अथवा केंद्रित समूहों द्वारा अपने लाभों को पूर्ण करने के लिए राज्य सत्ता प्रणाली में अपने स्थान को बनाये रखने की अध्भुत कला है उनकी यह सोच काफी हद तक सत्य भी प्रमाणि होती  है उनकी यह सोच आज कल की राज्य प्रणाली को देखते हुए पैदा हुई है ।
             हालाँकि भारत वर्ष सदैव ही गौरवशाली गुरुओं का प्रतीक रहा है जहाँ पर एक मामूली सा ब्राह्मण एक राह चलते बालक को सड़क से उठाकर अपनी समग्र कूटनीतियों का प्रयोग कर उस बालक को अखंड भारत वर्ष का सम्राट बना देता है; जहाँ पर एक गुरु अपने शाशक शिष्य को धर्म का मार्ग सिखाने के लिए बीच युद्ध में गीता का सार सुना देता है , आज की इस राजनीतिक अभ्यासक्रम में ऐसे गुरुओं के प्रखंड ज्ञान की कमी खल रही है | आध्यात्मिक गुरु जिनका कार्य लोगो के बीच आध्यात्म का ज्ञान प्रसारित करना है है यदि वो राजनीति के गलियारों में उतर कर उच्च पदासीन आकाओं की चापलूसी करने लगे की कब ये आये और मेरा आश्रम बडा हो जाये तो इस देश की उन्नति नही हो सकती । धर्म के नाम पर ढोंग कर रहे धर्म गुरु जो नफरत फैलाने की कोशिश में है यदि वो धर्म का असल अर्थ लोगो तक पहुचाना शुरू करे तो देश की काफी उन्नति होगी ।
             अराजकतावाद का सिद्धांत राज्य को समाप्त कर वहाँ रह रहे व्यक्तियों, समूहों और वहां राष्ट्रों के अंतर्गत आपसी सहयोगों द्वारा मानवीय मूल्यों के न्याय सम्बन्धो में न्याय को स्थापित करने के प्रयत्नों पर आधारित है | राजनीती में अगर आप सुनना बंद कर देंगे तो किसी भी राज्य या क्षेत्र का विकास नहीं हो सकता । अगर आप ये सोचे की हम तो ५ वर्ष के लिए निर्वाचित हो गए है अब हमारा कोई कुछ नही कर सकता तो यह सरासर गलत है। आज राजनीति एक अप्रासंगिक विषय बन चूका है लोग अपने बेडरूम में बैठकर शाम को चाय की चुस्कियों के साथ सरकार द्वारा हो रहे गलत कार्यों की चर्चा तो करते हैं परंतु उसे सुधरने के लिए खुद जमींन पर उतरना नही चाहते। 
                   हमें बताया गया है कि गणतंत्र हमें पश्चिम देशों ने सिखया है लेकिन आज से 2000 वर्ष पूर्व कालिदास द्वारा रचित प्रख्यात नाटक अभिज्ञान शाकुन्तलम में लोकतंत्र की परिभाषा कुछ इस प्रकार दी गयी है "अविश्रमोयम लोकतंत्रस्य सर्वाधिकारः" अर्थात आपका अपने राजा से मिलना यह आपका  लोकतान्त्रिक अधिकार है आप जब चाहें तब अपने राजा से मिल सकते हैं । यह परिभाषा आज के लोकतान्त्रिक अधिकार से धूमिल हो चुकी है। 
                  यदि आपका प्रधान सेवक आपके अधिकारों का हनन करता है या अपने कार्यों को सुचारू रूप से करने में असमर्थ है तो उस युग के शिक्षक, धर्मगुरु समाज से जुड़े लोगो का यह कर्त्तव्य बनता है कि वह समाज को सुधारने के लिए सड़क पर उतरे।
               अंत में इतना कहना चाहूंगा कि "राजनीती यह समाज को सुधारने के लिए है न की अपने खुद के फायदे के लिए" | अगर राजनीती अयोग्य बेटों के हाथ लग गयी तो देश को बर्बाद होने से कोई नही रोक सकता और यदि ये योग्य बेटों के हाथ में आयी तो भारत का सर्वोपरि बनाने का अब्दुल कलाम जी का सपना इसी सदी में पूरा हो जाएगा ।
जय हिंद
जय भारत
आशीष द्विवेदी की कलम से



Saturday, 10 June 2017

किसान : अन्नदाता

      

                  पिछले दिनों महाराष्ट्र में किसानो पर जो कार्यवाही हुई उससे मैं काफी आहत हुआ हूँ और अपनी सोच को अंकित करने पर मजबूर हुआ हूँ | मध्य प्रदेश में पुलिस प्रशाशन द्वारा किसानो पर इसलिए गोली चलने की कार्यवाही करनी पड़ी क्यूंकि किसान उग्र हो गये थे चलिए आज इसी मसले पर थोड़ी रौशनी डाली जाये | 
                     जब मैं स्कूल जाता था तब मेरे भूगोल के शिक्षक ने एक पाठ में सिखाया की हमारा भारत देश एक कृषि प्रधान देश है और हमारे देश की अधिकतर आय (जीडीपी) कृषि पर ही निर्भर करती है |परान्त यदि आकड़ों पर नजर डाली जय तो देख कर काफी शर्मिंदगी महसूस होगी की बड़ी तेजी से  किसान कर्ज के कारण आत्महत्या जैसे कदम उठा रहर हैं | NATIONAL SAMPLE SURVEY ORGANIZATION (NSSO) संस्था द्वारा २०१३ में किये गए सर्वे के अनुसार किसान की औसतन मासिक आय ६४२६ रुपये थी और उसी वर्ष की औसतन व्यय राशि थी ६२२३ रुपये | मतलब कुल मिला के वर्ष २०१३ में उनकी औसत मासिक बचत मात्र २०३ रूपये रही |

आखिर देख मरते किसान को
 नींद कैसे आती होगी देश के प्रधान को

                       अब आते है असल मुद्दे पर महंगाई दर २०१३ के हिसाब से २०१७ में बहुत ज्यादा बढ़ गयी है और  वर्ष २०१३ में भी मात्रा ६४२६ रुपये में अपने परिवार का पालन पोषण ठीक से नहीं हो सकता था | अपनी निजी जिंदगी को सुचारू रूप से चलाने के लिए तथा अपने बच्चो की पढ़ाई को पूर्ण करने के लिए फिर ये लाचार किसान कर्जदारों के पास जाकर अपनी जमीन या सम्पति का कोई हिस्सा गिरवी रख कर्ज लेता है और फिर उसे उचित निर्धारित समय पर न वापस कर पाने से व्याज बढ़ता जाता है और फीर उस किसान के पास आत्म हत्या करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता |सरकार द्वारा किये गए सभी वादे महज एक पन्ने पर अंकित बेकार शब्द बन कर रह गए हैं|  सरकार बनाने के लिए किसानो और गरीबो के लिए जुमलों की बौछार की जाती है | और बाद में वही सरकार बनते ही सारे वादे गायब हो जाते हैं | 
                    महाराष्ट्र  में प्रदर्शन कर रहे किसान भाइयों पर पुलिस प्रशाशन द्वारा बर्बरता से गोली चली गयी और ये कहा गया की प्रदर्शन कर रहे किसान उग्र हो गए थे उन्हें शांत कराने के लिए गोली चलनी पड़ीं | इस जवाब से मेरे मन में कुछ और सवाल खड़े हो गए हैं 

१) किसानो के उग्र होने का कारन कौन है ?
२) क्या इस स्तिथि को किसी और तरीके से नहीं संभाला जा सकता था ?
३) क्या किसानो के लिए कोई ऐसा फैसला नहीं लिया जा सकता की उन्हें प्रदर्शन करने की जरुरत ही न पड़ती ?
आखिरी सवाल 
४) अगर महाराष्ट्र  के किसानो पर उग्र होने की वजह से गोली चलनी पड़ी तो क्या कश्मीर में हो रहे उग्रवादिता को ध्यान में रख कर वहा की सरकार  द्वारा भो गोली का आदेश नहीं दे देना चाहिए ?
जो भगवान का सौदा करता है,
वो इंसान की क़ीमत क्या जाने? 
जो ‘धान’ की क़ीमत दे न सका, 
वो ‘जान’ की कीमत क्या जाने?
                                          @DrKumarVishwas

                         मैं बस  यही कहूंगा की इसपर सभी राजनितिक दाल को एकजुट होकर इस समस्या का समाधान निकलना चाहिए वरना जिस देश की अर्थव्यवस्था में सबसे अहम् योगदान जिसका है यदि उसे ही  जंतर मंतर पर मूत्र पी कर धरना देन पड़े या धरना देते समय गोली का शिकार होना पड़े  तो उस देश के लिए  इससे ज्यादा शर्म की बात नहीं होगी | किसान हमारे अन्नदाता हैं इन्ही की वजह से २ वक्त की रोटी मिलती है हमे इनकी इज्जत करनी चाहिए और इनकी तकलीफों का जल्द से जल्द निवारण करना चाहिए नहीं तो स्थिति आगे और बिगड़ते ही जाएगी.................

                  जय हिन्द  
जय जवान जय किसान
ASHISH DWIVEDI की कलम से