भारतीय संस्कृति में जिस विवाह संस्कार की पद्धति का वर्णन है वह अतुलनीय है , किंतु कुछ समय से एक लालची समुदाय के द्वारा इस पूजनीय संस्कार का मजाक उड़ाया जा रहा है ।
हिन्दू धर्म के अनुसार जब किसी व्यक्ति में परिवार निर्माण की जिम्मेदारी निभाने योग्य मानसिक, शारीरिक परिपक्वता आ जाती है तो वो विवाह के योग्य माना जाता है ।
विवाह संस्कार पद्धति में कहीं भी दहेज़ प्रथा का वर्णन नही किया गया है। दहेज़ प्रथा एक उपहार के तौर पर शुरू हुई थी और आज वह अपने सबसे निकृष्ट स्तर को दर्शाने लगी है। कई शादियां मंडप से वापस लौट जाती हैं।
दहेज़ ने समाज को बीमार कर दिया है। यदि मुझे दहेज़ की व्याख्या देनी पड़े तो वह कुछ इस प्रकार होगी "दहेज़ एक प्रथा नही बल्कि भीख मांगने की सामाजिक तरीका है, फर्क इतना है कि इसमें दहेज़ देने वाले की गर्दन हमेशा झुकी होती है और लेने वाले में अकड़ बनी रहती है"। हमारे समाज में कुछ ऐसे पशु रूपी इंसान भी पाए जाते हैं जो दहेज़ न मिलने पर प्रताड़ित करने में अपनी मानवीय मूल्यों से परे हटकर हैवानियत की सारी सीमाएं लाँघ देते हैं। दहेज़ न मिलने के कारण ससुराल पक्ष द्वारा दी जा रही प्रताड़ना से तंग आकर अधिकांश महिलाएं मृत्यु का वरण कर लेती हैं। भारतीय राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो से प्राप्त जानकारी के अनुसार 2012 में दहेज़ प्रताड़ना से तंग होकर 18233 मृत्यु की घटनाएं दर्ज की गयी हैं। यह बड़े शर्म की बात है कि जिस गौरवशाली देश में स्रियों को माता का दर्जा दिया जाता है वहां पर कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले लोग समाज को खोखला करने में लगे हुए हैं।
हालाँकि अब इसका विरोध करने की क्षमता आज के युवाओं में पैदा होने लगी है। क़ानूनी नजर से देखें तो दहेज़ लेना व देना दोनों अपराध है, यदि कोई दहेज़ की मांग करता है या इसको किसी भी रूप में बढ़ावा देता है तो यह कानूनन अपराध है। यदि कोई ऐसा करता है तो भारतीय न्याय सहिंता के अनुसार धारा 3(दहेज़ लेने), 4(दहेज़ देने),498(A)(दहेज़ के लिए क्रूरता) और धारा 304 (प्रताड़ना के वजह से होने वाली मृत्यु) के अंतर्गत शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
दहेज़ प्रथा से होने वाला नुकसान हमारे अपने समाज का है। अब उचित समय आ गया है कि हम प्रण
करें की हम न दहेज़ लेंगे और न ही दहेज़ देंगे। यदि आज कोई ठोस कदम नही उठाये गए तो याद रखिए कल को यह आपके और हमारे घर को भी जला सकता है। इसलिए यह चिंगारी भीषण आग का रूप ले ले इसे पानी डाल कर बुझा देने में ही भलाई है।
जय हिंद
जय भारत
आशीष द्विवेदी की कलम से
Tuesday, 19 December 2017
दहेज़ : प्रथा या अभिशाप
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